आज के समय में जब हम बच्चों के पोषण, शिक्षा और टीकाकरण की बात
करते हैं, तब एक अत्यंत आवश्यक विषय अक्सर उपेक्षित रह जाता है — डीवॉर्मिंग (कृमिनाशक दवा देना)। आंतों में
रहने वाले कीड़े बच्चों के शारीरिक, मानसिक और शैक्षणिक विकास पर गहरा नकारात्मक प्रभाव
डालते हैं। अनुमान है कि 1 से 14 वर्ष की आयु
के लगभग 22 करोड़ भारतीय बच्चे कृमि संक्रमण के खतरे में हैं। समाज और अभिभावकों को
यह समझना आवश्यक है कि नियमित डीवॉर्मिंग बच्चों के स्वस्थ भविष्य के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण
है जितना टीकाकरण।भारत जैसे विकासशील देश में साफ पानी, स्वच्छ शौचालय और स्वच्छ
भोजन की उपलब्धता अभी भी कई क्षेत्रों में सीमित है। ऐसे वातावरण में बच्चों में राउंडवर्म,
हुकवर्म, पिनवर्म जैसे आंतों के कीड़ों का संक्रमण बहुत आम है। ये कीड़े बच्चों के
शरीर से पोषक तत्व चूस लेते हैं, जिससे बच्चा कमजोर, एनीमिक और कुपोषित हो जाता है।
कई बार बच्चा ठीक से खाना खाने के बाद भी वजन नहीं बढ़ा पाता, पढ़ाई में ध्यान नहीं
लगा पाता और जल्दी थक जाता है।
कृमि संक्रमण के लक्षणों में पेट दर्द, उल्टी, दस्त, भूख न लगना, वजन कम होना, खुजली, दांत पीसना, चिड़चिड़ापन और बार-बार बीमार पड़ना शामिल हैं। लंबे समय तक यदि इन कीड़ों का इलाज न हो, तो यह बच्चे की लंबाई, वजन और बौद्धिक विकास को भी प्रभावित कर सकता है। कुछ मामलों में गंभीर एनीमिया और आंतों में रुकावट जैसी जटिलताएं भी हो सकती हैं।इसी कारण सरकार द्वारा हर वर्ष राष्ट्रीय डीवॉर्मिंग दिवस मनाया जाता है, राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में दो चरणों में मनाया जाता है – पहला चरण 10 फरवरी को और दूसरा चरण 10 अगस्त को प्रतिवर्ष। राष्ट्रीय कृमि नाशक दिवस का उद्देश्य विद्यालयों और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से 1 से 19 वर्ष की आयु के सभी स्कूली बच्चों (पंजीकृत और गैर-पंजीकृत) को कृमि नाशक दवा देना है, ताकि उनके समग्र स्वास्थ्य, पोषण स्तर, शिक्षा और जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सके। जिसमें स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों को एल्बेंडाजोल जैसी सुरक्षित दवाएं दी जाती हैं। यह दवाएं सस्ती, प्रभावी और डॉक्टरों द्वारा प्रमाणित होती हैं।

समाज में यह भ्रांति फैली हुई है कि डीवॉर्मिंग दवा से बच्चे को नुकसान हो सकता है, पेट खराब हो जाएगा या बच्चा कमजोर हो जाएगा। जबकि सच्चाई यह है कि यह दवाएं बच्चे को नुकसान नहीं, बल्कि कीड़ों से बचाकर उसे मजबूत बनाती हैं। हल्की उल्टी या पेट दर्द जैसी मामूली प्रतिक्रिया कुछ बच्चों में हो सकती है, जो कुछ घंटों में अपने आप ठीक हो जाती है।
नियमित डीवॉर्मिंग से बच्चों में पोषण का अवशोषण बेहतर होता है, भूख बढ़ती है, वजन सही रहता है, खून की कमी कम होती है और बच्चा अधिक सक्रिय व ध्यान केंद्रित करने में सक्षम होता है। इसका सीधा लाभ उसकी पढ़ाई, खेलकूद और आत्मविश्वास पर पड़ता है।
अभिभावकों की भूमिका यहां अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चों को साफ हाथों से खाना सिखाना, नाखून कटवाना, जूते पहनाकर बाहर भेजना, साफ पानी पिलाना और खुले में शौच से बचाना — ये सभी आदतें डीवॉर्मिंग के साथ मिलकर कृमि संक्रमण को रोकने में मदद करती हैं। लेकिन केवल स्वच्छता ही पर्याप्त नहीं, नियमित डीवॉर्मिंग दवा देना भी उतना ही जरूरी है।
हर माता-पिता को यह समझना चाहिए कि डीवॉर्मिंग कोई बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि एक आवश्यक रोकथाम है। जैसे हम समय पर टीका लगवाते हैं, वैसे ही समय पर डीवॉर्मिंग कराना भी हमारी जिम्मेदारी है। यदि हम अपने बच्चों को स्वस्थ, मजबूत और सक्षम नागरिक बनाना चाहते हैं, तो हमें डीवॉर्मिंग को गंभीरता से अपनाना होगा। समाज, स्कूल, स्वास्थ्य कर्मी और माता-पिता — सभी को मिलकर इस दिशा में जागरूकता फैलानी होगी। क्योंकि स्वस्थ बच्चा ही स्वस्थ समाज की असली पहचान है।
कृमि संक्रमण के लक्षणों में पेट दर्द, उल्टी, दस्त, भूख न लगना, वजन कम होना, खुजली, दांत पीसना, चिड़चिड़ापन और बार-बार बीमार पड़ना शामिल हैं। लंबे समय तक यदि इन कीड़ों का इलाज न हो, तो यह बच्चे की लंबाई, वजन और बौद्धिक विकास को भी प्रभावित कर सकता है। कुछ मामलों में गंभीर एनीमिया और आंतों में रुकावट जैसी जटिलताएं भी हो सकती हैं।इसी कारण सरकार द्वारा हर वर्ष राष्ट्रीय डीवॉर्मिंग दिवस मनाया जाता है, राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में दो चरणों में मनाया जाता है – पहला चरण 10 फरवरी को और दूसरा चरण 10 अगस्त को प्रतिवर्ष। राष्ट्रीय कृमि नाशक दिवस का उद्देश्य विद्यालयों और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से 1 से 19 वर्ष की आयु के सभी स्कूली बच्चों (पंजीकृत और गैर-पंजीकृत) को कृमि नाशक दवा देना है, ताकि उनके समग्र स्वास्थ्य, पोषण स्तर, शिक्षा और जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सके। जिसमें स्कूल और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से बच्चों को एल्बेंडाजोल जैसी सुरक्षित दवाएं दी जाती हैं। यह दवाएं सस्ती, प्रभावी और डॉक्टरों द्वारा प्रमाणित होती हैं।

समाज में यह भ्रांति फैली हुई है कि डीवॉर्मिंग दवा से बच्चे को नुकसान हो सकता है, पेट खराब हो जाएगा या बच्चा कमजोर हो जाएगा। जबकि सच्चाई यह है कि यह दवाएं बच्चे को नुकसान नहीं, बल्कि कीड़ों से बचाकर उसे मजबूत बनाती हैं। हल्की उल्टी या पेट दर्द जैसी मामूली प्रतिक्रिया कुछ बच्चों में हो सकती है, जो कुछ घंटों में अपने आप ठीक हो जाती है।
नियमित डीवॉर्मिंग से बच्चों में पोषण का अवशोषण बेहतर होता है, भूख बढ़ती है, वजन सही रहता है, खून की कमी कम होती है और बच्चा अधिक सक्रिय व ध्यान केंद्रित करने में सक्षम होता है। इसका सीधा लाभ उसकी पढ़ाई, खेलकूद और आत्मविश्वास पर पड़ता है।
अभिभावकों की भूमिका यहां अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चों को साफ हाथों से खाना सिखाना, नाखून कटवाना, जूते पहनाकर बाहर भेजना, साफ पानी पिलाना और खुले में शौच से बचाना — ये सभी आदतें डीवॉर्मिंग के साथ मिलकर कृमि संक्रमण को रोकने में मदद करती हैं। लेकिन केवल स्वच्छता ही पर्याप्त नहीं, नियमित डीवॉर्मिंग दवा देना भी उतना ही जरूरी है।
हर माता-पिता को यह समझना चाहिए कि डीवॉर्मिंग कोई बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि एक आवश्यक रोकथाम है। जैसे हम समय पर टीका लगवाते हैं, वैसे ही समय पर डीवॉर्मिंग कराना भी हमारी जिम्मेदारी है। यदि हम अपने बच्चों को स्वस्थ, मजबूत और सक्षम नागरिक बनाना चाहते हैं, तो हमें डीवॉर्मिंग को गंभीरता से अपनाना होगा। समाज, स्कूल, स्वास्थ्य कर्मी और माता-पिता — सभी को मिलकर इस दिशा में जागरूकता फैलानी होगी। क्योंकि स्वस्थ बच्चा ही स्वस्थ समाज की असली पहचान है।